कंगन

खुश हूँ मैं उतने में ही,
मैंने जितना भी तुझको पाया था।

किसी के जाने के बाद भी इश्क़ रहता है,
ये तेरे जाने के बाद मुझे समझ आया था।

तुझपे ही उस आखरी मुलाक़ात में,
अलग होने के फ़ितूर छाया था।

वरना मैं तो तुझे पहनाने को,
अपनी माँ के कंगन लाया था।

Written – Gautam Rajpurohit

Treasure of words

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